By RamthaMedia
RamthaMedia Free eBooks · August 2026
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Preface
तेलंगाना में हर हफ्ते कोई नई योजना, कोई नया शिलान्यास या कोई नई घोषणा सुनने को मिलती है — मुफ्त बस यात्रा से लेकर एक नए शहर तक। यह किताब उन सारी खबरों को एक जगह जोड़कर बताती है कि राज्य सरकार असल में किस दिशा में बढ़ रही है। इसमें किसानों की योजनाएं, महिलाओं के नाम मकान, स्कूली बच्चों का नाश्ता, सरकारी कर्मचारियों का बीमा, एक नया शहर और नदियों की लड़ाई — हर हिस्सा असली आंकड़ों और असली घोषणाओं पर टिका है। पढ़ने के बाद आप बता पाएंगे कि इनमें से क्या आज आपके काम का है और क्या अभी सिर्फ बन रहा है।
Chapter 1
एक किसान, एक इंजीनियर और 2047 का एक विज़न डॉक्यूमेंट
कोडंगल के पास कोस्गी गांव का एक किसान अपने खेत में खड़ा है। कुछ हफ्ते पहले उसके गांव में सड़क, कॉलेज और एक लिफ्ट इरिगेशन योजना की नींव एक ही दिन में रखी गई — कुल मिलाकर करीब 4,369 करोड़ रुपये के काम। उसी शाम, हैदराबाद के एक आईटी दफ्तर में बैठा एक युवा इंजीनियर अपनी कंपनी के नए निवेश की खबर पढ़ रहा है, जो शहर के बाहर बन रहे एक नए शहर में आ रहा है। दोनों को शायद पता भी न हो, लेकिन दोनों एक ही दस्तावेज़ से जुड़े हैं — तेलंगाना राइज़िंग 2047।
यह कोई साधारण योजना नहीं, बल्कि एक विज़न डॉक्यूमेंट है, जिसे दिसंबर 2025 में भारत फ्यूचर सिटी में हुए तेलंगाना राइज़िंग ग्लोबल समिट में जारी किया गया। मुख्यमंत्री श्री ए. रेवंत रेड्डी के मुताबिक, इस दस्तावेज़ को बनाने में इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस, नीति आयोग और करीब 4 लाख लोगों की ऑनलाइन राय शामिल की गई।
इस विज़न का मूल आधार तीन आर्थिक क्षेत्रों में राज्य का बंटवारा है — सेवा, विनिर्माण और कृषि। इन तीनों को तीन नाम दिए गए हैं: कोर अर्बन रीजन इकोनॉमी (CURE), पेरी-अर्बन रीजन इकोनॉमी (PURE) और रूरल एग्रीकल्चर रीजन इकोनॉमी (RARE)। यही तीन शब्द इस किताब के बाकी अध्यायों में भी बार-बार लौटेंगे, क्योंकि हर योजना किसी न किसी तरह इन्हीं तीन दायरों में फिट बैठती है।
लक्ष्य साफ बताए गए हैं — 2034 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, और 2047 तक, जब देश आज़ादी के सौ साल पूरे करेगा, 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था। सरकार के मुताबिक तेलंगाना देश की आबादी का करीब 2.9% हिस्सा है, लेकिन राष्ट्रीय जीडीपी में उसका योगदान करीब 5% है — और 2047 तक इसे 10% तक ले जाने की बात कही गई है।
इस अध्याय के बाकी सारे किस्से — मुफ्त बस से लेकर नई सिंचाई परियोजना तक — इसी एक दस्तावेज़ की अलग-अलग शाखाएं हैं। सवाल यह नहीं कि यह विज़न कितना बड़ा है, बल्कि यह कि इसका कौन-सा हिस्सा किसान, कर्मचारी, छात्र या व्यापारी — किसके जीवन में कब पहुंचता है। अगले अध्याय वहीं से शुरू होते हैं, जहां यह विज़न घर के दरवाज़े तक पहुंचता है — महिलाओं के नाम पर बने मकान और मुफ्त बस यात्रा से।
Chapter 2
निःशुल्क बस यात्रा और एक महिला के अपने नाम पर घर
सिकंदराबाद के परेड ग्राउंड में जून 2026 में सैकड़ों महिलाएं जमा हुईं। मौका था 553 बसों को टीजी-आरटीसी को सौंपने का — ये बसें खुद महिला स्वयं सहायता समूहों की मालिकाना हक़ में हैं और किराए के आधार पर आरटीसी को चलाने के लिए दी गई हैं। मुख्यमंत्री ने वहीं घोषणा की कि आने वाले समय में 3,000 और बसें इसी तरह सौंपी जाएंगी।
यह महालक्ष्मी योजना की एक शाखा है, जिसके तहत महिलाओं को आरटीसी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गई है। सरकार के अपने आंकड़ों के मुताबिक, इस मुफ्त यात्रा के एवज़ में राज्य सरकार ने अब तक 10,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की राशि आरटीसी को चुकाई है। यह पैसा किसी विज्ञापन में नहीं, बल्कि सीधे परिवहन निगम के खाते में जाता है, ताकि निगम को नुकसान न उठाना पड़े।
इसी सभा में मुख्यमंत्री ने एक और बात साफ की — इंदिराम्मा योजना के तहत बन रहे मकान हमेशा महिला के नाम पर ही मंजूर किए जाते हैं, चाहे परिवार में कोई भी कमाने वाला हो। शहरी इलाकों में एक लाख मकान बनाने की योजना पर काम चल रहा है, और ये मकान भी उसी नियम के तहत महिला के नाम दर्ज होंगे। सरकार की दलील यह है कि अगर संपत्ति महिला के नाम हो, तो परिवार में उसकी हैसियत और सौदेबाज़ी की ताकत, दोनों बदल जाती हैं।
इसके अलावा स्वयं सहायता समूहों को बैंकों से जोड़ने का एक बड़ा काम भी चल रहा है — करीब 61,000 करोड़ रुपये का बैंक लिंकेज दिया गया है, और सरकार ने बिना ब्याज़ के कर्ज़ की योजना के तहत बैंकों को करीब 2,000 करोड़ रुपये अलग से चुकाए हैं ताकि महिलाओं को ब्याज़ न देना पड़े। पेट्रोल पंप, कैंटीन और यहां तक कि स्कूल यूनिफॉर्म सिलने का काम भी अब महिला समूहों को सौंपा जा रहा है।
इन सारी योजनाओं के पीछे एक साफ आंकड़ा भी है — फिलहाल राज्य में करीब 67 लाख महिलाएं इन स्वयं सहायता समूहों की सदस्य हैं, और सरकार का ऐलान है कि 2034 तक एक करोड़ महिलाओं को सदस्य बनाकर आर्थिक रूप से मज़बूत करना है। यहीं से अगला सवाल उठता है — घर और बस की सुविधा तो मिल गई, लेकिन उस घर में बड़े होने वाले बच्चों की पढ़ाई का क्या इंतज़ाम है?
Chapter 3
नाश्ता, यूनिफॉर्म और वह नर्सरी कक्षा जो पहले नहीं थी
वनपर्ती जिले के कोठकोटा में एक सरकारी बालिका उच्च विद्यालय की नई इमारत के उद्घाटन के दिन, मुख्यमंत्री ने वहां खड़ी छात्राओं से सीधी बात की। उन्होंने बताया कि 15 अगस्त तक राज्य के 27.50 लाख छात्रों को शिक्षा किट दी जाएगी — इस काम पर करीब 1,000 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।
इस किताब के लिए ज़रूरी बात यह है कि यह किट या नाश्ता कोई अकेली घोषणा नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का हिस्सा है। सरकारी स्कूलों में पहले नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी की पढ़ाई नहीं होती थी, जिसके चलते शहर में आकर बसने वाले गरीब परिवारों को अपने छोटे बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में भेजना पड़ता था। अब यही कक्षाएं सरकारी स्कूलों में भी शुरू की जा चुकी हैं, और नर्सरी से लेकर 12वीं कक्षा तक नाश्ता, दोपहर का खाना और शाम का नाश्ता तीनों दिए जा रहे हैं।
आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा पर राज्य के बजट का करीब 8 से 9 प्रतिशत हिस्सा (करीब 26,600 करोड़ रुपये) खर्च हो रहा है, और हर छात्र पर सालाना करीब 1.08 लाख रुपये सरकार खर्च कर रही है। इतनी बड़ी रकम खर्च होने के पीछे एक नतीजा भी सामने आया है — केंद्र सरकार के परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स में तेलंगाना 36वें स्थान से 18वें स्थान पर पहुंच गया है।
शिक्षकों के लिए भी बदलाव हुए हैं — 16 साल से रुकी हुई पदोन्नतियां और 10 साल से न हुए तबादले, दोनों को पूरा किया गया, जिसमें 23,000 शिक्षकों को पदोन्नति और 30,000 से ज़्यादा को तबादला मिला। इसके साथ ही डीएससी के ज़रिए महज़ 55 दिनों में 11,000 शिक्षकों की भर्ती पूरी की गई। शिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय अनुभव देने के लिए फिनलैंड और जर्मनी जैसे देशों में अध्ययन दौरे भी भेजे जा रहे हैं — पहले साल 50 शिक्षक गए, अगले साल 150 भेजे जाने की बात कही गई है।
इस पूरे बदलाव के पीछे जो सोच बार-बार दोहराई जाती है, वह यह है कि 12वीं कक्षा के बाद छात्रों को स्किल-आधारित शिक्षा की ओर ले जाना है, ताकि व्हाइट-कॉलर नौकरियों की तंगी के बीच वे ब्लू-कॉलर हुनर के दम पर आगे बढ़ सकें। यही सोच अगले अध्याय के लिए भी ज़मीन तैयार करती है, जहां बात खेत और फसल की होगी — क्योंकि गांव के स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के मां-बाप अक्सर किसान ही होते हैं।
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Chapter 4
बीज, बोनस और वह समिति जो फसल पर नज़र रखती है
दिसंबर 2023 में, सरकार बनने के कुछ ही दिनों बाद, मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि रायतु बंधु की राशि किसानों के खातों में 11 दिसंबर से जमा होना शुरू हो जाए। साथ ही 2 लाख रुपये तक के फसल ऋण माफ करने की योजना पर काम शुरू करने के निर्देश भी दिए गए।
लेकिन असली बदलाव खरीद प्रक्रिया में दिखा। जून 2026 में हुई एक समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को साफ कहा कि बीज बांटने से लेकर फसल की खरीद तक, हर चरण की पूरी जानकारी कृषि विभाग के पास होनी चाहिए। इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाने का आदेश दिया गया, जिसमें कृषि विभाग के निदेशक, नागरिक आपूर्ति निगम के प्रबंध निदेशक और योजना विभाग के सचिव शामिल हैं।
यह समिति सिर्फ कागज़ी नहीं है — इसे किस किसान ने कौन-सी फसल बोई, किस गांव में कितने रकबे में कौन-सी फसल है, और अनाज की खरीद कब-कहां होगी, यह सब का हिसाब रखना है। जिन किसानों ने महीन धान (सन्ना वड्लु) की खेती की है, उन्हें बोनस दिया जा रहा है, और इसके लिए सात किस्मों के महीन धान के बीज सब्सिडी पर किसान वेदिकाओं के ज़रिए उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया है।
मक्के की खरीद का एक उदाहरण खुद मुख्यमंत्री ने बताया — पहले जहां एक टन मक्का 13,000 रुपये में बिकता था, वहीं इस बार सरकार की रणनीति के चलते टेंडर दर 21,000 रुपये प्रति टन से ऊपर पहुंची। यह आंकड़ा बताता है कि खरीद-प्रक्रिया में बदलाव सिर्फ योजना का नाम बदलने से नहीं, बल्कि बाज़ार में सही समय पर सही फैसले लेने से आता है।
इसी बैठक में एक और दिलचस्प बात सामने आई — भद्राद्री कोठागुडेम जिले के दम्मपेट मंडल में शुरू किए गए एक एआई पायलट प्रोजेक्ट के नतीजों का अध्ययन कर, इसे कृषि विभाग के बाकी कामकाज में भी इस्तेमाल करने की बात कही गई है। साथ ही खाद वितरण को पारदर्शी बनाने के लिए एक ऐप के ज़रिए बुकिंग की व्यवस्था लाने का आदेश भी दिया गया है, जिसकी ज़िम्मेदारी हर जिले के अतिरिक्त कलेक्टर को सौंपी गई है। खेत की यह कहानी आखिरकार सरकारी दफ्तर तक भी पहुंचती है — क्योंकि जिन अधिकारियों को यह सब लागू करना है, उन्हीं के लिए अगला अध्याय है।
Chapter 5
हर सरकारी कर्मचारी के लिए एक बीमा पॉलिसी
हैदराबाद के रवींद्र भारती सभागार में जून 2026 में एक अलग तरह का समारोह हुआ — न कोई नई सड़क, न कोई नई इमारत, बल्कि राज्य सरकार और 16 बैंकों के बीच बीमा को लेकर हुए समझौते। मुख्यमंत्री ने वहां कहा कि सिंगरेनी, बिजली विभाग या आरटीसी — जो भी हो, हर जगह असली मालिक सरकार ही है, इसलिए कर्मचारियों को बिना मांगे सुरक्षा देना सरकार की ज़िम्मेदारी है।
इसकी मिसाल खुद सिंगरेनी से दी गई। वहां के मज़दूरों को बिना एक भी रुपया दिए एक करोड़ रुपये तक का बीमा कवर मिलता है, और मुख्यमंत्री के मुताबिक जब यह प्रस्ताव पहली बार आया था, तो बहुत लोगों को इस पर भरोसा नहीं था। अब वही मॉडल राज्य के बाकी कर्मचारियों के लिए भी लाया जा रहा है।
इस बीमा योजना के अलावा, कर्मचारियों से जुड़े कुछ और आंकड़े भी सामने आए। रिटायरमेंट की उम्र 58 से बढ़ाकर 61 साल की गई, जिसके चलते 2024 से रिटायरमेंट रुक-रुक कर शुरू हुए और हर महीने रिटायरमेंट बेनिफिट्स का बोझ बढ़ता गया। सरकार के मुताबिक इसके बावजूद हर महीने 200 से 700 करोड़ रुपये तक इन बेनिफिट्स के लिए चुकाए गए, और 100 दिनों में 6,000 करोड़ रुपये देने के वादे के तहत पहली किस्त के रूप में 1,000 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।
तनख्वाह के समय को लेकर भी एक बदलाव बताया गया — पहले महीने की पहली तारीख को तनख्वाह देना मुश्किल होता था, अब हर महीने पहली तारीख को ही भुगतान किया जा रहा है। इसके साथ ही सरकार बनने के बाद से अब तक 70,000 पद भरे जा चुके हैं, जिसका सीधा असर सरकारी खज़ाने पर अतिरिक्त बोझ के रूप में पड़ा है।
यह पूरा अध्याय एक बात साफ करता है — जिस विज़न डॉक्यूमेंट की बात पहले अध्याय में हुई थी, उसे ज़मीन पर उतारने वाले असल में यही कर्मचारी हैं, चाहे वह मेट्रो का इंजीनियर हो या राशन कार्ड बांटने वाला क्लर्क। इसीलिए अगला अध्याय उस जगह की बात करता है, जहां यह पूरा तंत्र एक नए शहर के रूप में इकट्ठा हो रहा है।
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Chapter 6
तीन अक्षरों के इर्द-गिर्द बना एक नया शहर
रंगारेड्डी जिले के मीरखानपेट में जून 2026 में एक इमारत का उद्घाटन हुआ — फ्यूचर सिटी डेवलपमेंट अथॉरिटी (FCDA) का मुख्यालय। खास बात यह थी कि इस इमारत का निर्माण दिसंबर में शुरू होकर ठीक 150 दिनों में पूरा हुआ। मुख्यमंत्री ने इसे 'हमारे अफसरों की तेज़ रफ़्तार योजना' का नतीजा बताया।
यह इमारत भारत फ्यूचर सिटी नाम के एक बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसे नेट-ज़ीरो शहर के तौर पर बनाया जा रहा है। इसके पीछे वही तीन अक्षर काम कर रहे हैं जिनका ज़िक्र पहले अध्याय में हुआ था — CURE, PURE और RARE। हैदराबाद के आउटर रिंग रोड (ORR) के भीतर के 2,100 वर्ग किलोमीटर इलाके को, जहां करीब 1.34 करोड़ लोग रहते हैं, प्रदूषण-मुक्त 'कोर अर्बन रीजन' के तौर पर विकसित करने की योजना है।
इसी योजना के तहत ORR के भीतर की प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों को बाहर, 'पेरी-अर्बन' यानी PURE क्षेत्र में भेजा जा रहा है। इस PURE ज़ोन में सबसे पहले शुरू होने वाली इकाई प्रीमियर एनर्जीज़ की सोलर मॉड्यूल फैक्ट्री रही, जिसकी क्षमता 5.6 गीगावाट है और जिसे बनने में महज़ 12 महीने लगे। इसके साथ ही महबूबनगर जिले के दिविटिपल्ली में अमर राजा कंपनी ने एक बैटरी सेल फैक्ट्री शुरू की, जिसकी क्षमता 32 गीगावाट-घंटा है और जहां काम करने वाले करीब 700 कर्मचारियों में से 400 महिलाएं हैं।
यह सिर्फ फैक्ट्री लगाने की बात नहीं है। सरकार का कहना है कि पुरानी निवेश-नीतियों को पूरी तरह हटाया नहीं गया, बल्कि जो जनहित में सही थीं, उन्हें और बेहतर बनाकर आगे बढ़ाया गया — जैसे पर्यटन, ऊर्जा, चिकित्सा और खेल से जुड़ी नई नीतियां। इसके पीछे मकसद यह है कि निवेशकों को सिर्फ ज़मीन नहीं, बल्कि एक साफ नीति और तेज़ प्रक्रिया भी दिखे।
एक शहर बनाना एक बात है, लेकिन उस शहर तक पानी, बिजली और सिंचाई पहुंचाना बिल्कुल दूसरी बात है। और यहीं तेलंगाना का सबसे पुराना और सबसे उलझा हुआ मसला सामने आता है — पड़ोसी राज्यों के साथ नदी जल का बंटवारा, जिसकी कहानी अगले और आखिरी अध्याय में है।
Chapter 7
वे नदियाँ जिनके लिए तेलंगाना अब भी लड़ रहा है
अगस्त 2026 में दिल्ली के जल शक्ति मंत्रालय के दफ़्तर में मुख्यमंत्री और राज्य के सिंचाई मंत्री एक ऐसी बैठक में बैठे थे, जिसका नतीजा किसी शहर या फैक्ट्री की तरह तुरंत नहीं दिखता — लेकिन उसका असर लाखों किसानों तक पहुंचता है। मुद्दा था प्राणहिता नदी पर बन रहे तुम्मिडीहेट्टी बैराज की ऊंचाई।
पहले दोनों राज्यों — तेलंगाना और महाराष्ट्र — के बीच 148 मीटर ऊंचाई पर बैराज बनाने का समझौता हुआ था। लेकिन पुणे स्थित सेंट्रल वॉटर एंड पावर रिसर्च स्टेशन के अध्ययन के मुताबिक, 148 मीटर की ऊंचाई पर गुरुत्वाकर्षण के ज़रिए पानी की सप्लाई संभव नहीं है, जबकि 150 से 152 मीटर की ऊंचाई पर यह मुमकिन है — और अध्ययन यह भी कहता है कि दोनों ऊंचाइयों में डूब क्षेत्र (सबमर्जेंस) में कोई बड़ा फ़र्क नहीं है। इसी आधार पर तेलंगाना ने केंद्र से महाराष्ट्र को मनाने की मांग की है, ताकि पुराने आदिलाबाद जिले को सिंचाई सुविधा मिल सके।
यह अकेली नदी-लड़ाई नहीं है। जून 2026 में कर्नाटक के होस्पेट में तुंगभद्रा बांध के 33 नए गेटों के उद्घाटन के मौके पर तीन राज्यों के मुख्यमंत्री एक साथ मौजूद थे। तेलंगाना को राजोलिबंडा डायवर्ज़न स्कीम के तहत 15.9 टीएमसी पानी का हिस्सा मिलना तय है, लेकिन बांध में जमी गाद और पानी ले जाने की दिक्कतों के चलते अभी सिर्फ 5 टीएमसी पानी ही इस्तेमाल हो पा रहा है — बाकी 10 टीएमसी गडवाल और अलमपुर के किसानों तक नहीं पहुंचता।
इसके अलावा दिंडी परियोजना के तहत 30 टीएमसी पानी के आवंटन पर भी बातचीत जारी है, और पालमूरु-रंगारेड्डी लिफ्ट सिंचाई परियोजना को राष्ट्रीय दर्जा दिलाने की मांग भी केंद्र के सामने लंबित है। सरकार का कहना है कि पुनर्गठन अधिनियम के तहत हर साल मिलने वाली राशि में से 2019 से 2024 तक के करीब 1,800 करोड़ रुपये और 15वें वित्त आयोग के 2,233.54 करोड़ रुपये अब भी केंद्र से आना बाकी है।
इन सारी बातचीतों का कोई तुरंत नतीजा नहीं दिखता — कोई नई सड़क नहीं खुलती, कोई नई फैक्ट्री शुरू नहीं होती। लेकिन जिस किसान का ज़िक्र इस किताब के पहले अध्याय में हुआ था, उसके खेत तक पानी पहुंचेगा या नहीं, यह अंततः इन्हीं मीटिंग-रूम की बातचीत पर टिका है। तेलंगाना राइज़िंग 2047 का विज़न जितना बड़ा दिखता है, उतना ही उसका आधार इन छोटी, धीमी और अक्सर अनदेखी रह जाने वाली बातचीतों पर टिका हुआ है।
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